SP की संयुक्त बैठक के चार दिन बाद ही मुड़वारा स्टेशन के पास यात्री पर हमला, रेल यात्रियों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल
कटनी। रेल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर हाल ही में चार दिन पहले पुलिस अधीक्षक की अगुवाई में जीआरपी और आरपीएफ के साथ बड़ी संयुक्त बैठक आयोजित की गई थी। बैठक में स्टेशन आउटरो, रेल लाइनों के आसपास के शैडो एरिया, स्मॉल डॉग कॉलोनियों और अपराध प्रभावित क्षेत्रों में सख्त निगरानी, संयुक्त गश्त और अपराधियों की धरपकड़ के निर्देश दिए गए थे। दावा किया गया था कि रेल यात्रियों पर होने वाली वारदातों पर प्रभावी अंकुश लगाया जाएगा।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब बैठकें हो चुकी थीं, रणनीति तैयार हो चुकी थी और पुलिस अलर्ट मोड में होने का दावा कर रही थी, तब आखिर मुड़वारा स्टेशन के पास एक बाहरी यात्री के साथ इतनी बड़ी वारदात कैसे हो गई?
कोतवाली थाना क्षेत्र अंतर्गत मुड़वारा स्टेशन के पास उत्तर प्रदेश के गाजीपुर निवासी अजय कुमार शर्मा के साथ हुई लूट और जानलेवा हमले की घटना ने पुलिस व्यवस्था के तमाम दावों की हवा निकाल दी है। बदमाशों ने यात्री को घेरकर उसके सिर पर डंडों से हमला किया और मोबाइल, पर्स, वोटर आईडी तथा करीब 3200 रुपये नकद लूटकर फरार हो गए।
बैठक का असर जमीन पर क्यों नहीं दिखा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस “शैडो एरिया” और स्टेशन आउटर की निगरानी को लेकर बैठक में विशेष चर्चा हुई थी, वही इलाका बदमाशों के लिए सुरक्षित ज़ोन कैसे बना रहा? क्या संयुक्त बैठक सिर्फ कागजी कवायद बनकर रह गई? क्या रात की गश्त सिर्फ रजिस्टरों तक सीमित है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्टेशन रोड, आउटर और आसपास के इलाकों में लंबे समय से असामाजिक तत्व सक्रिय हैं। रात के समय राहगीरों और यात्रियों के साथ छीना-झपटी और लूट की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं, लेकिन स्थायी कार्रवाई अब तक नहीं दिखी।
चलानी कार्रवाई में सक्रिय, लेकिन वारदात के वक्त गायब रही पुलिस?
स्थानीय लोगों के बीच अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि मुड़वारा स्टेशन के आसपास कोतवाली पुलिस अक्सर वाहन चेकिंग और चलानी कार्रवाई करते हुए दिखाई देती है। देर रात तक दोपहिया और चारपहिया वाहनों को रोककर दस्तावेज जांचना आम बात है, लेकिन जब एक यात्री पर जानलेवा हमला हुआ और लूट की वारदात हुई, तब मौके पर कोई पुलिस सहायता क्यों नहीं पहुंची?
घायल यात्री को नहीं मिली तत्काल मदद
घटना के बाद घायल यात्री मदद की उम्मीद लेकर कोतवाली थाना पहुंचा, लेकिन वहां भी उसे संवेदनशीलता के बजाय औपचारिकता का सामना करना पड़ा। आरोप है कि पुलिस ने सिर्फ आवेदन लेकर उसे चलता कर दिया। घर लौटने तक के पैसे नहीं बचे थे, ऐसे में पीड़ित जीआरपी के पास भी भटकता रहा। बाद में जब मामला मीडिया के संज्ञान में आया, तब जाकर पुलिस तंत्र सक्रिय हुआ और यात्री को उसके गृह नगर भेजने की व्यवस्था की गई।
अपराधियों के हौसले बुलंद या सिस्टम कमजोर?
रेलवे स्टेशन और उसके आसपास का क्षेत्र संवेदनशील माना जाता है, जहां प्रतिदिन हजारों यात्रियों की आवाजाही होती है। ऐसे इलाके में खुलेआम लूट और हमला होना यह साबित करता है कि अपराधियों में पुलिस का भय कम होता जा रहा है।
अब सवाल यह है कि —
- क्या संयुक्त बैठकों का असर सिर्फ प्रेस नोट तक सीमित रहेगा?
- क्या स्टेशन क्षेत्र में सक्रिय गिरोहों पर वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई हुई?
- आखिर यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
- और सबसे बड़ा सवाल — जब पुलिस अलर्ट होने का दावा कर रही थी, तब बदमाश इतने बेखौफ कैसे हो गए?

























